मंत्र अपरिमित सामर्थ्य युक्त होते हैं।
इनके कार्य करने के स्तर भिन्न भिन्न होते हैं।
आपने पढ़ा होगा सुना होगा कहीं की कलिकाल के आरम्भ के समय भगवान ने करोड़ों मंत्रो को कीलित कर दिया…
फिर भी अनेकानेक सिद्ध मंत्र आज भी जन सामान्य में प्रसारित है । और परिश्रमी उसका लाभ भी उठाते आएं हैं ।
किन्तु आज मैं बात कर रहा हूँ मंत्रों के क्रिया तीव्रता के स्तर के आधार पर विविधता की…
वो भी एक मंत्र था जो रुद्रांश दुर्वासा ऋषि ने सेवा से प्रसन्न हो देवी कुंती को उनका भविष्य जान कर दिया।
जो वांछित देव का अंश पुत्र रूप में त्वरित देने में समर्थ था ।
आज सामान्यतया जो मंत्र प्रचलित हैं उनका दीर्घ जप करने के पश्चात ही उनसे वांछित उद्देश्य पूर्ण हो सकता हैं।
किन्तु वास्तव में आज भी ऐसे ऐसे मंत्र होते हैं जो 5 माला में आधा माला में यहां तक कि मात्र उंगली पर गिनकर 11 बार जपने मात्र से अद्भुत प्रचण्ड प्रभाव प्रकट करते हैं।
आश्चर्यचकित कर देते हैं ,साधक और उसके निकटस्थों को…
वो एक अलग ही लेवल होता है मंत्र शक्ति का…
ये मंत्र मांगने से नहीं मिलते
चाटुकारिता करने से नहीं मिलते
योजना बद्ध तरीके से गुरु को प्रसन्न करने से नहीं मिलते
रुपये से तो सौ जन्मों में भी नहीं मिल सकता
हिंसा से भी नहीं मिल सकता हैं।
अगर कोई सोचे की गुरु को मारकर मंत्र डायरी वगैरा से प्राप्त हो जाएगा तो भी एक बात समझ लें आपको मंत्र का सिर्फ शरीर प्राप्त होगा वो भी मुर्दा…
उसको प्राणांवित करने की अनुमति देने का कारक ही नष्ट हो चुका होगा ।
महत्व मंत्र का तो है ही नहीं कभी रहा भी नहीं…
वो एक माध्यम बनता हैं।
महत्व उस स्वीकृति का है जो सीधे सीधे महादेव द्वारा दी जाती है,
जो साधक को एक नियत छूट प्रदान करती है अन्यान्य की तुलना में…
गुरु एक संयोजक माध्यम बन जाते उनके जो बहुत बड़े वाले भाग्यशाली होते हैं।
फिर वो क्या कारण है जिनसे ऐसे स्तर की स्वीकृति/मंत्र मिलना संभव हो सके…????
ध्यान के अभ्यास से…
जो अभीष्ट है उसी के लोभ से आत्ममुक्ति प्राप्त करने से…
सरल शब्दों में इसे ही अघोर कह सकते हैं।
स्वयं को ज्यादा से ज्यादा निश्छल निष्कपट निष्कलंक बनाने से ।
साधनाओं मंत्रों के बाल बुद्धि प्रेरित संग्रह से बचने से ।
इष्ट साधना में एकाग्रता पूर्वक लीन रहने से…
स्वीकृति शरीर को जरा भी नहीं
प्राण को भी नहीं किंतु
पात्रता को ही दी जाती है…
ॐ नमः शिवाय !!!