सिर्फ साधक के लिए-
आपका गुरु कितना श्रेष्ठ है या नहीं
इसका निर्णय समाज शिष्य की सफलता के अनुरूप ही करता हैं।
और शिष्य कितनी सफलता प्राप्त कर पाता है , यह निर्भर करता है की वो गुरु आज्ञा के पालन में कितना अधिक दृढ़ और गुरु चरित्र व्यक्तित्व से कितना अधिक एकाकार है।
न कि इससे की वो चीख चीख कर लोगो से दिन रात ये बताए कि उसका गुरु कितना अधिक महान है। अथवा गुरु के भजन कीर्तन करने , शिव से नारायण से ऊपर गुरु को समाज में स्थापित करने की कहानियों के प्रचार प्रसार में संलग्न हो…
गुरु आज्ञा का पालन व्यक्ति नहीं करेगा…
क्योंकि कोई भी वास्तविक गुरु अपने अग्रजों को अपने मार्ग का अनुसरण का ही निर्देश देता है जो कि श्रम साध्य होता है। न कि स्वयं की महिमा मंडन अथवा प्रचार प्रसार का निर्देश देता हैं कभी भी किसी भी गुरु के किसी भी निर्देश को देख समझ लें इस संदर्भ में….
प्रचार प्रसार सिर्फ धर्म का ही उचित हैं।
इसलिए निज गुरु की श्रेष्ठता को प्रमाणित करने के लिए उनके दिखाए मार्ग का कठोर परिश्रम पूर्वक अनुसरण करके बड़ी सफलता फिर वो किसी भी परिप्रेक्ष्य में हो कि प्राप्ति में ही है।
जीवन में कभी-कभी समय व्यक्ति को किंकर्तव्यविमूढ़ कर देता है ।
व्यक्ति को यह समझ नहीं आता की वो क्या करें क्या नहीं करे
ऐसे में अगर—-
1- चित्त में शांति हो और जड़ता भी हो तो उसे साधना के अपेक्षा ध्यान और एकाग्रता का अभ्यास करना चाहिए संभव हो तो ब्रह्मकाल में ।
2- चित्त में शांति नहीं हो और जड़ता भी नहीं हो तो उसे विभिन्न स्तोत्रों आदि की काम्य प्रयोग करने चाहिए इसके उदाहरण समय समय पर लिखता रहा हूँ…!!!
3- जब चित्त में शांति नहीं हो और जड़ता हो व्यक्ति अवसाद मई हो व्यग्र हो तो उसे पूर्व कृत किसी मंत्र का लघु हवन या उतारा या गुरु निर्दिष्ट अन्य बहोत छोटे कर्म कांड सम्पन्न करने चाहिए इसमें तर्पण कर्म भी सम्मिलित है।
4- जब चित्त में शांति हो किन्तु जड़त्व नहीं हो तब ही सही समय होता हैं मंत्र जाप का…
कुछ संग्रह कर लेने का भविष्य के लिए भविष्य….न सिर्फ इस शरीर का वरण वस्तुतः हमारा (प्राण तत्व) भी…
और वो एक आपात काल का आत्म सहायक भी सिद्ध होता है किसी समय …
किन्तु वास्तव में आज जब व्यक्ति निजी आपातकाल में फंसता है तब वो लोहा पीटकर उसे तलवार बनाने की चेष्टा में लगता है।
गुरु का चमतकार सिर्फ और सिर्फ उनके लिए घटित होता हैं जो मन से वचन से कर्म से उससे एकाकार होते हैं। चापलूसों के लिए नहीं…
हमारी धर्म संस्कृति और आध्यात्म की श्रद्धा विश्वास की पकड़ हमारी आने वाली पीढ़ियों में पीढ़ी दर पीढ़ी कमजोर पड़ती जा रही है।
इसका जो सबसे बड़ा कारण हैं वो है सनातन का सागर जैसा विस्तृतता और समाज में अधिकाधिक प्रस्तुत उसका मनमाना व्याख्यान उसका निजी हित के अनुरूप व्याख्यान धार्मिक व्यापार के संवर्धाननुकूल व्याख्यान….
आदि गुरु शंकराचार्य जी ने जो परिष्कृतिकरण किया था अपने समय वैसा बृहदतम प्रयास आज के देश काल परिस्थितिनुरूप आवश्यक हो गया है।
हर व्यक्ति भटक रहा है धर्म से संबंधित अपने ही प्रश्नों को लेकर…
समाज को आज फिर आदि शंकराचार्य जी जैसे मार्तण्ड की आवश्यकता हो चली है…
शिव कृपा से ही नारायण कृपा से ही धर्मोत्थान संभव हो सकेगा…
ॐ नमः शिवाय ।