साधना पथ के प्रत्येक पथिक के मन मानस में किसी न किसी साधनात्मक विशिष्टता के प्राप्ति की इच्छा होती ही है ।
और यह बिल्कुल भी गलत नहीं है ।
किन्तु दुर्भाग्य है की उन सभी में 99.99% को गुरुत्व चेतना संस्पर्श की न्यूनता के कारण वो ऐसी इच्छा को पूर्ण नहीं कर पाते हैं।
और कुछ इससे भी बड़े दुर्भाग्यशाली होते हैं जो छद्मगुरुओं के जाल में फंसकर शून्य से भी नीचे की स्थिति को प्राप्त करते हैं।
देखो प्रत्येक व्यक्ति की चाहत होती है की उसका एक महल जैसा भवन हो..अप्सरा तुल्य सौख्यप्रद भार्या हो…भोजन के बदले व्यंजन हो…महल में ही स्विमिंग पूल और गार्डेन सब हों
किन्तु व्यक्ति यह भूल जाता हैं की महल का निर्माण शनैः शनैः होगा शिलापूजन होगा ,नींव निर्माण होगा ढांचा बनेगा दीवालें बनेंगी प्लास्टर होगा , और हजार अन्य आवश्यक काम होने के बाद ही वो महल में निवास का सुख प्राप्त कर पाओगे…
उसकी मजबूती कमजोरी से संज्ञान होंगे , क्या और कैसे उसे क्षति देगा पता होगा…कैसे उसे मेंटेन रखना है ताकि उसका सौंदर्य/दीपन जाज्वल्यमान बना रहे ज्ञात होगा…
वर्तमान साधना पथ के पथिकों की प्रायः आने वाली समस्या यही है की वो झोपड़ी या पेड़ के नीचे बने तिरपाल से सीधे महल के बारामदे का स्वपन व्यापारियों के माध्यम से पालते हैं और झोपड़ी से भी हाथ धो बैठते हैं।
और जब उन्हें यह बताया भी जाता हैं की एक एक करके कार्य करना होगा तब भवन का सुख मिलेगा तो उन्हें सुप्त चेतना के कारण वो सब गलत लगता है
और वो भटकता रहता हैं चमत्कार के खोज में सर पर हाथ रखते ही महल प्रकट होने के आस में …
बिना इस विषय का विश्लेषण किए की क्या जो लोग तुम्हे ऐसे स्वप्न दिखा रहें हैं क्या स्वयं उन्होंने इतनी आसानी से उसे पाया था…
वास्तविकता तो और भी ज्यादा कटु है एक झोपड़ी दूसरे झोपड़ी को बरगलाने में लगा हैं।
इसलिए इसे समझने की आवश्यकता है की बिना कठोर परिश्रम किए आपके जीवन में बदलाव नहीं आने वाला हैं।
जादू या एकाएक चमत्कार नहीं होगा किसी के साथ नहीं होता
होना होता तो हो जाता कब का
और अगर परिश्रम के बल पर आप अपना जीवन स्तर में बदलाव ला पा रहे हैं तो यह स्वयं भी कलियुग में चमत्कार ही हैं।
कहने का तात्पर्य विशिष्टता की प्राप्ति के लिए उसका एक उचित और दृढ़ आधार का निर्मित किया जाना आवश्यक है।
अगर वो ही नहीं है तो विशिष्टता कहाँ टिकेगी !
जब भवन का आधार ही नहीं होगा ,मूल ढांचा ही नहीं होगा ,तो उसको कैसे सजाना संवारना है उसका क्या औचित्य बचेगा विचार करो !
इसलिए स्वयं को तपाना आवश्यक है, एक मूल भूत ढांचा बनाना आवश्यक है। हर प्रकार से दृढ़ करना आवश्यक है। न्यूनताओं को मिटाना आवश्यक है। तब जाकर हम विशिष्टता की अर्हता को प्राप्त होते हैं।
ॐ नमः शिवाय ।