जातीय व्यवस्था और साधनात्मक दृष्टिकोण

जाति का विभेद मनुष्यो से पूर्व पशुओं पक्षियों एवं वनस्पतियों में देखो,

विश्लेषण से आपको प्रत्येक जाति की अपनी गुणवत्ता और लाभ हानि प्राप्त होते हैं।

पुनः जब आप इन पशु पक्षी और वनस्पतियों के भीतर देखेंगे तो उसमें भी अनेक जाति विभेद स्वतः ही दृष्टिगोचर होगा ।

एक ही पशु पक्षी की अनेक जाति मिल जाएंगे जैसे कुत्ते, गाय ,मुर्गियों आदि में

चावल सब्जी आदि में अनेक विभेद मिल जाएंगे ।

जैसे मनुष्यों में अलग अलग देशों और परिवेशों में विभेद प्रस्तुत होता हैं।

किन्तु

एक ही देश में उपलब्ध मनुष्यों में जाति भेद कहाँ से आएं ???

यह आएं कर्म से धर्म से, धर्म अर्थात दायित्व से, परिवेश से, और जीवन स्तर के विभिन्न संस्कारों के निर्वाहन से…-

जैसे एक ही जाति की दो गायों के भोजन में बदलाव करने से..उनसे मिलने वाले दूध की गुणवत्ता प्रभावित हो जाती है

एक ही जाति के फसल को दिए गए उपचारों में भेद उनके उत्पादन को प्रभावित कर देता हैं।

यही है कर्म जनित जाति व्यवस्था…

और मनुष्य की जैविक अनुवांशिक उद्विकास इसका प्रभाव निःसंदेह अगली बीजों में भी डालता ही हैं।

जैव विकास का यह नियम है की क्रमशः सही उपचार देने से गलत उपचार से पैदा हुए बीज भी एक दो पीढ़ी बाद बहुत ज्यादा उत्तम गुड़वत्ता युक्त होते चले जाते हैं।

विज्ञान इस क्रिया को सुजननिकी कहता हैं।

सनातन का प्रयास था ग्रुपिंग करके गुड़वत्ता में क्रमिक सकारात्मक विकास करने का ..

किन्तु

मनुष्य के लालच ने एक बेहतरीन प्रयास को मानवता का सबसे बड़ा अभिशाप प्रस्तुत कर दिया…

मनुष्य के लालच का परिणाम यह हुआ की जो ऊची जातियां भी हैं या थी उनको जन्मजात उच्चता के भ्रम के कारण उनके सैद्धान्तिक कुपोषण करके उन्हें सामान्य बना दिया हैं । और जो न्यून थें वो उसी में खुश हैं और ज्यादा न्यून होने को प्रयत्नशील हैं क्योंकि उससे मुफ्त का धन मिल रहा है सहज…

जरा विचार करें

की समाज का कितना बड़ा नुकसान हुआ अगर देखा जाए तो ओवरऑल सभी का ही पतन हो रहा हैं सनातन के मापदंडों पर…

आध्यातमिक कुपोषण का शिकार है 80% हिन्दू समाज वर्तमान में…

हम सभी को निजी लाभ हानि से ऊपर उठकर अपना छोटा से छोटा योगदान प्रथम स्वयं के उत्थान में द्वितीय अपनो के उत्थान मात्र में दें…

जब आप स्वस्थ होंगे तभी आपके द्वार किसी को स्वास्थ्य पर दिया उपदेश का कोई सार्थकता निकलती है।

इसलिए समाज को आज पुनः अपनी प्राचीन विरासत सनातन संस्कृति की तरफ लौटने का समय आ चुका है।

काली•••!!!

Scroll to Top