साधक साधना और तपश्चर्या
तप बल तें जग सृजइ बिधाता। तप बल बिष्नु भए परित्राता॥
तपबल संभु करहिं संघारा। तप तें अगम न कछु संसारा॥
तप के बल से ब्रह्मा जगत को रचते हैं। तप के ही बल से विष्णु संसार का पालन करने वाले बने हैं तप ही के बल से रुद्र संहार करते हैं। संसार में कोई ऐसी वस्तु नहीं जो तप से न मिल सके।
दूध को तपाने से मलाई और घी निकलता है। धातुओं को तपाने से वे बहुमूल्य भस्म और रसायन बनती हैं। सामान्य अन्न तपाये जाने पर स्वादिष्ट आहार बनता है, मिट्टी को तपाने से पत्थर बनती है। कच्चा लोहा पकाने पर ही फौलाद बनता है। स्वर्ण की आभा अग्नि संस्कार से ही निखरती है।
खारी और भारी समुद्र जल तपने के उपराँत मीठा और हलका बादल बनकर आकाशगामी होता और तृषित भूमि की तृप्ति करता है। हिमालय पर जमी बरफ तपने पर ही गंगा-यमुना का सम्मान पाती है, तपता हुआ सूर्य अपनी आत्मा और ऊष्मा से समस्त विश्व में प्राण वर्षा करता है और ग्रह परिवार को अपने साथ बाँध रहने में समर्थ है।
यदि यह सब तपने के लिये तैयार न हों, कच्चे और शिथिल ही बने रहें तो उनमें प्रखरता उत्पन्न न होगी ऐसी ही कच्ची कमजोर स्थिति में पड़े रहेंगे। दबी हुई समर्थता को उभारने के लिए तप एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है।
वह कष्ट साध्य तो है पर उसके द्वारा होने वाले लाभों को देखते हुए महत्ता इतनी बड़ी है कि उसे घाटे का सौदा नहीं कह सकते हैं।
व्यायामशाला में किया हुआ तप पहलवान बनाता है। पाठशाला में तप करने वाला विद्वान बनता है। खेत का तपस्वी सुसम्पन्न कृषक बनता है। पत्थर को प्रतिमा, कागज को चित्र बना देने की क्षमता मूर्तिकार के, चित्रकार के तप में ही सन्निहित है।
लौकिक जीवन में पग-पग पर कठोर श्रम, पुरुषार्थ, साहस, मनोयोग की महत्ता स्पष्ट है। अध्यात्म क्षेत्र में भी यही तथ्य काम करता है। तपस्वी शक्तिशाली बनते हैं और उस तप साधित शक्ति के आधार पर वे भौतिक सिद्धियों से सम्पन्न बनते हैं। इतिहास के महामानवों, ऋषियों, तत्वदर्शियों, देवदूतों की महत्ता उसके तप के कारण ही प्रकाशवान हुई है।
देवताओं के वरदान केवल तपस्वियों के लिये सुरक्षित रहते हैं। केवल याचना प्रार्थना से किसी का कुछ प्रयोजन सिद्ध नहीं हुआ है। पुराणों का प्रत्येक पृष्ठ तप साधना के द्वारा उपलब्ध विभूतियों की महत्ता प्रतिपादित करता है धर्म-शास्त्रों में तपश्चर्या का महात्म्य ही विभिन्न प्रकारों और प्रकरणों में गाया गया है।
मनुष्य के भीतर बहुत कुछ दिव्य, अलौकिक एवं अद्भुत है। उसके उत्खनन के लिए तपश्चर्या अनिवार्य है। भगवान ने विभूतियों का भण्डार मानवी कलेवर में भर दिया है, पर उससे लाभान्वित होने का अधिकार उसी को दिया है जो तप साधना द्वारा अपनी पात्रता सिद्ध कर सके।
समुद्र में अनादि काल से अगणित रत्न भरे पड़े हैं पर उन्हें प्राप्त करने के लिये गहरे में गोता लगाने का साहस करना पड़ता है। जब समुद्र मंथन किया गया तो उसमें से 14 रत्न निकले, यदि वह कठोर पुरुषार्थ न किया गया होता तो उन रत्नों के प्राप्त होने की आशा कैसे की जा सकती थी। देवताओं ने गौरवशाली पद तप साधना से ही प्राप्त किये हैं।
इसके बिना वे भी अन्य प्राणियों की तरह मात्र जीवधारी ही बने रह सकते थे। जो तप की कष्ट साध्य प्रक्रिया को देखकर डरा, या घबराया उसके लिए विभूतियों ने अपना द्वार बन्द ही कर दिया है। सहज ही सब कुछ प्राप्त करने का स्वप्न देखते रखने वाले व्यक्ति खाली हाथ ही रहते हैं।
हमें अभीष्ट उद्देश्य के लिए तपस्वी बनने का प्रयत्न करना चाहिए और इस मान्यता को दृढ़तापूर्वक हृदयंगम कर लेना चाहिए कि भौतिक उन्नति के लिये जिस प्रकार कठोर श्रम और प्रचण्ड साहस की, एकाग्र मनोयोग की आवश्यकता पड़ती है उसी प्रकार आत्मिक विभूतियाँ प्राप्त करने के लिये तप साधना की अनिवार्य आवश्यकता रहती है। जो इस मूल्य को चुका सकते हैं वे ही शक्तियों और सिद्धियों से सम्पन्न होते हैं।
तपश्चर्या की उपलब्धियों का वर्णन विवेचन करते हुए शास्त्रकारों ने कहा है कि ईश्वर भी तप के प्रभाव से ही इस सृष्टि की रचना में समर्थ हुआ है। मनुष्य के लिए तो अभीष्ट उपलब्धियों के लिए भी तप ही एकमात्र मार्ग है।
लेखक – प्रिय संजय भाई जी